उत्तराखंड की राजनीति में एक नया चेहरा सामने आया है — दिवंगत विधायक शैलारानी रावत की बेटी ऐश्वर्या रावत ने अब औपचारिक रूप से राजनीतिक जीवन की शुरुआत कर दी है। लंबे समय से यह चर्चा थी कि वे अपनी मां की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सकती हैं, खासकर केदारनाथ विधानसभा सीट पर उपचुनाव के माध्यम से। लेकिन अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त कर नई जिम्मेदारी सौंप दी है। यह नियुक्ति न सिर्फ ऐश्वर्या के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत है, बल्कि यह संकेत भी है कि भाजपा उन्हें भविष्य के लिए एक प्रभावशाली महिला नेता के रूप में तैयार कर रही है।
जिम्मेदारी को सेवा का अवसर मानती हैं ऐश्वर्या
अपनी नई भूमिका को लेकर ऐश्वर्या रावत ने कहा कि यह उनके लिए गर्व और जिम्मेदारी दोनों का विषय है। उन्होंने सरकार का आभार व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि वे अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करेंगी। उनका लक्ष्य है — जरूरतमंद महिलाओं तक पहुँचना, उनकी समस्याओं को समझना और उन्हें न्याय दिलाने में सहयोग करना। उन्होंने यह भी कहा कि महिला आयोग के माध्यम से वे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों के खिलाफ काम करने पर ज़ोर देंगी।
मां की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प
9 जुलाई 2023 को जब केदारनाथ से भाजपा विधायक शैलारानी रावत का निधन हुआ, तभी से इस बात की अटकलें लगने लगी थीं कि उनके बाद राजनीतिक विरासत कौन संभालेगा। ऐश्वर्या को लेकर भी यह उम्मीद की जा रही थी कि वे उपचुनाव में मैदान में उतर सकती हैं, लेकिन भाजपा ने उन्हें संगठनात्मक और सामाजिक भूमिका में मौका देकर उनकी राजनीतिक यात्रा का एक अलग मार्ग चुना है।
ऐश्वर्या ने स्पष्ट कहा कि वे अपनी दिवंगत मां के अधूरे कार्यों और जनसेवा के संकल्प को आगे बढ़ाएंगी। वे मां की तरह ही समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुँचने और उनकी समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाने को अपना लक्ष्य मानती हैं।
शिक्षा, संस्कार और आत्मविश्वास – महिला सशक्तिकरण की कुंजी
अपने पहले वक्तव्य में ऐश्वर्या रावत ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि महिलाएं अगर अपनी शिक्षा, योग्यता और संस्कारों पर विश्वास रखें, तो वे किसी भी कठिन परिस्थिति से उभर सकती हैं। समाज में महिलाओं के प्रति अपराधों को केवल कानून से नहीं, बल्कि सोच में बदलाव से कम किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि महिलाएं खुद जागरूक हों और अपने अधिकारों को पहचानें।
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