देहरादून, 20 अगस्त 2026। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) में भारतीय वन सेवा (IFS) के 2025-2027 बैच के परिवीक्षार्थियों और प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रॉयल भूटान वन सेवा के अधिकारियों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने वन संरक्षण, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को आने वाले समय की वानिकी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उपराष्ट्रपति ने अधिकारियों से कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, देश की विकास आवश्यकताओं को पूरा करते हुए प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने अधिकारियों से ऐसे निर्णय लेने का आग्रह किया, जिनमें वर्तमान जरूरतों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के हितों को भी ध्यान में रखा जाए।
वन सेवा की जिम्मेदारी आने वाले वर्षों में और बढ़ेगी
उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए देश के प्राकृतिक संसाधनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। आने वाले दशकों में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों पर वनों, वन्यजीवों, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
उन्होंने कहा कि देश की पारिस्थितिक सुरक्षा को मजबूत करने में वन सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच वन क्षेत्रों का संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों से भी जुड़ा है।
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। ऐसे में वन क्षेत्र कार्बन अवशोषण, जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को उनकी भविष्य की जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया।

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन पर जोर
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश के विकास के लिए बुनियादी ढांचे, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की जरूरत है, लेकिन इन विकास कार्यों के दौरान पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने अधिकारियों से संरक्षण और विकास, पारिस्थितिक सुरक्षा और स्थानीय आजीविका तथा वर्तमान जरूरतों और भावी पीढ़ियों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का आग्रह किया।
वन क्षेत्रों से जुड़े फैसलों में स्थानीय परिस्थितियों को समझना भी महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगल, जलस्रोत, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में वन प्रबंधन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय जरूरतों और परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है।
स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को महत्व देने की अपील
उपराष्ट्रपति ने उन समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव का सम्मान करने पर भी जोर दिया, जो पीढ़ियों से वन क्षेत्रों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के साथ रहते आए हैं।
उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों ने लंबे समय के अनुभव के आधार पर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण ज्ञान विकसित किया है। इस ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी के साथ जोड़कर अधिक प्रभावी और टिकाऊ मॉडल तैयार किए जा सकते हैं।
यह दृष्टिकोण वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका और सहभागिता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। वन प्रबंधन से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदायों का विश्वास और सहयोग हासिल करना दीर्घकालिक संरक्षण के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
आधुनिक तकनीक से बदलेगा वन प्रबंधन
उपराष्ट्रपति ने वानिकी के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती तकनीकी भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने नई पीढ़ी के वन अधिकारियों से कहा कि वे अपने क्षेत्रीय अनुभव और निर्णय क्षमता के साथ आधुनिक तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल करें।
उन्होंने विशेष रूप से रिमोट सेंसिंग, GIS, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित प्रणालियों को वन प्रबंधन से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
इन तकनीकों के माध्यम से वन क्षेत्रों की निगरानी, वनावरण में बदलाव का आकलन, वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित डेटा का विश्लेषण अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकता है।
हालांकि, उपराष्ट्रपति ने तकनीक के इस्तेमाल के साथ मानवीय संवेदनशीलता और क्षेत्रीय अनुभव को भी जरूरी बताया। उनके अनुसार, तकनीक निर्णय लेने में सहायता कर सकती है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों को समझने की क्षमता भी एक वन अधिकारी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिक वानिकी और सभ्यतागत ज्ञान का समन्वय जरूरी
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के सतत भविष्य के निर्माण के लिए आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और भारत के सभ्यतागत ज्ञान को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।
भारत में प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ी पारंपरिक सोच लंबे समय से मौजूद रही है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध, तकनीक और डेटा आधारित प्रबंधन को इस पारंपरिक समझ के साथ जोड़कर वन संरक्षण के लिए अधिक प्रभावी दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।
उन्होंने अधिकारियों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बेहतर कार्यप्रणालियों को अपनाने और सफल मॉडलों से सीखने का भी आग्रह किया।
सत्यनिष्ठा को बताया लोक सेवा की आधारशिला
उपराष्ट्रपति ने वन सेवा के अधिकारियों को लोक सेवा में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के महत्व की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक पद पर रहते हुए कठिन परिस्थितियों में लिए जाने वाले निर्णय संविधान, कानून, विज्ञान और व्यापक जनहित के अनुरूप होने चाहिए।
उन्होंने अधिकारियों को यह संदेश दिया कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान व्यक्तिगत हितों की बजाय राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके अनुसार, वन सेवा के अधिकारियों के निर्णयों का प्रभाव केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पर्यावरण, स्थानीय समुदायों, वन्यजीवों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है।

टीमवर्क को व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण बताया
उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों से व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय टीम की सफलता को महत्व देने की अपील की। उन्होंने कहा कि संस्थानों और राष्ट्र का निर्माण लगातार सामूहिक प्रयासों से होता है।
वन प्रबंधन जैसे व्यापक क्षेत्र में वन विभाग के साथ स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों, समुदायों और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है। इसलिए अधिकारियों को टीम भावना के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
वन सेवा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना सकारात्मक संकेत
उपराष्ट्रपति ने भारतीय वन सेवा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान बैच में लगभग 17 प्रतिशत महिलाएं हैं और इसे सकारात्मक बदलाव तथा नारी शक्ति का प्रमाण बताया।
उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी संस्थानों को अधिक विविध और प्रभावी बनाने में योगदान देती है। वन सेवा में भी महिलाओं की भूमिका आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगी।
पद नहीं, काम के प्रभाव से हो करियर का मूल्यांकन

अधिकारियों को करियर के दौरान अपनी सफलता का आकलन केवल पद और जिम्मेदारियों के आधार पर नहीं करने की सलाह देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि वास्तविक उपलब्धि इस बात से तय होनी चाहिए कि उन्होंने समाज और पर्यावरण के लिए क्या योगदान दिया।
उन्होंने अधिकारियों से अपने कार्य का मूल्यांकन पुनर्स्थापित किए गए वनों, संरक्षित किए गए वन्यजीवों, स्थानीय समुदायों के अर्जित विश्वास और भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ी गई विरासत के आधार पर करने का आग्रह किया।
उन्होंने अधिकारियों से राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए “राष्ट्र प्रथम” का संदेश दिया।
उत्तराखंड के प्रमुख पदाधिकारी रहे मौजूद

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त), मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, आईजीएनएफए के निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कोर्स निदेशक श्रीमती अजीता लोंगजाम सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
देहरादून में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों, तकनीकी विकास और स्थानीय समुदायों की भूमिका के बीच संतुलन बनाकर काम करने का संदेश मिला। आने वाले वर्षों में इन अधिकारियों की जिम्मेदारी देश के वन संसाधनों और जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ विकास की आवश्यकताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की होगी।
मुख्य संदेश: उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि भारत के सतत भविष्य के लिए विकास और संरक्षण को साथ लेकर चलना होगा। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक वानिकी, स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और ईमानदार लोक सेवा के समन्वय से ही प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव है।


